शनिवार, 12 अप्रैल 2014

१२२. पेड़ पथिक से



तुम्हारे आने की खबर सुनकर 
लो, मैंने विदा कर दिया पतझड़,
समय से पहले बुला लिया वसंत,
कोमल हरे पत्ते ओढ़ लिए,
बिछा दी फूलों की चादर.

पथिक, तुम्हारे काम, तुम्हारे श्रम,
तुम्हारी सेवा-भावना को सलाम,
मंज़िल तक पहुँचने के तुम्हारे निश्चय,
तुम्हारे दृढ संकल्प को सलाम.

बहुत दूर से आ रहे हो तुम,
बहुत दूर जाना है तुम्हें,
थोड़ी देर को भूल जाओ सब कुछ,
थोड़ी देर सुस्ता लो मेरी छांव में,
पथिक, मुझ पर उपकार करो,
मेरा होना सार्थक करो.

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना रविवार 13 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 14/04/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

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  3. सेवा में ऐसी ही भावना होनी चाहिये...

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  4. वृक्ष का पैगाम सिर्फ कहन नहीं , कर दिखाता है !
    बहुत बढ़िया !

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  5. बहुत खूब ! मंगलकामनाएं . . . .

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  6. पेड़ के मनोभाव खूब व्‍यक्‍त हुए...बधाई

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  7. काश हर किसी को अपने होने कि सार्थकता को पूरा करने का निश्चय हो ...
    भावपूर्ण ...

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