रविवार, 20 अप्रैल 2014

१२३. आकाश


जितना तुम्हें दिखता है,
आकाश सिर्फ़ उतना ही नहीं है.

आकाश तो बहुत विशाल है,
बहुत सुन्दर,विविधता से भरा,
वह कभी कहीं नहीं जाता,
हमेशा वहीँ रहता है,
बस तरह-तरह के रंग दिखाता है,
कभी नीला,कभी लाल,कभी सफ़ेद
और कभी-कभार इन्द्र-धनुषी.

कभी उसपर सितारे बिखर जाते हैं,
कभी चाँद निकल आता है,
कभी सूरज चमक उठता है,
कभी बादल छा जाते हैं.

मैं सच कह रहा हूँ,
आकाश वास्तव में ऐसा ही है,
कभी दीवारों से बाहर निकलो,
कभी खुले में आओ, तो जानो 
कि जिसे तुम पूरा आकाश समझते थे,
वह तो उसका एक छोटा सा टुकड़ा था.

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-04-2014) को ""वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक" (चर्चा मंच-1590) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना बुधवार 23 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. काश एक टुकड़ा आकाश मेरा भी होता :)

    बहुत सुंदर !!

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  4. अपने आकाश से निकल कर मुक्त भाव् से आसमां को तांकना जरूरी है ... आकाश कि सम्पूर्णता को नापने के लिए ...

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  5. आकाश एकदम खुला है - जितना चाहो समा लो ! !

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  6. सच अपने आकाश से परे एक हम सबका आकाश भी होता है। . बस उसे देखने-समझने की जरुरत होती हैं।
    बहुत बढ़िया

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  7. अपने हिस्से के आकाश (पर कैपिटा आकाश) पर प...से और रसूख वालों का कब्ज़ा है...

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  8. एक ऐसा आकाश जो हम सबके लिए एक सा उपलब्ध है सुन्दरता से भरा हुआ, बस अपनी अपनी दीवारों से बाहार आने की देर है. भावप्रवण रचना, बधाई.

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  9. भावो को व्यकत करती एक सुन्दर रचना !!

    मेरे ब्लॉग की नयी पोस्ट "मै मख्खन बेचता हूँ " पढ़ने के लिए मेरे ब्लॉग manojbijnori12.blogspot.com पर आये और अपने सुझावाओ से हमे मार्गदर्शित करें

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  10. काश सभी समझ पाते कि स्वयं के आकाश के परे एक आकाश और भी है...बहुत प्रभावी रचना...

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  11. बहुत सुन्दर और प्रभावपूर्ण रचना
    मन को छूती हुई

    आग्रह है----
    और एक दिन

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