शुक्रवार, 27 मार्च 2015

१६२. माँ

वह औरत जो गुम हो गई मेरी यादों से,
चौखट पर मेरी राह तकती होगी.

सुधर रही है मेरी तबीयत रफ़्ता-रफ़्ता,
उसकी नींद फिर भी उचटती होगी.

मेरी आवाज़ सुनने की ख्वाहिश में,
वह फ़ोन के इर्द-गिर्द टहलती होगी.

यह सोचकर कि मैं परेशां न हो जाऊं,
अपना दर्द वह दबाकर रखती होगी.

सुबह की गाड़ी से मेरा आना सुनकर,
वह रातभर करवटें बदलती होगी.

रास आ गई है मुझको परदेस की फ़िज़ां,
मेरी याद में वह गाँव में सिसकती होगी.

8 टिप्‍पणियां:

  1. श्री राम नवमी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (29-03-2015) को "प्रभू पंख दे देना सुन्दर" {चर्चा - 1932} पर भी होगी!
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुबह की गाड़ी से मेरा आना सुनकर,
    वह रातभर करवटें बदलती होगी.
    माँ तो माँ है वो सब और इससे भी ज्यादा करती है ... अपनी सोच से बहुत आगे रहती है ... सुन्दर भावपूर्ण रचना ...

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  3. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना...

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  4. Nice Article sir, Keep Going on... I am really impressed by read this. Thanks for sharing with us. Latest Government Jobs.

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