रविवार, 1 मार्च 2015

१५८. अगर...

एक अरसे से ख्वामख्वाह जीता रहा हूँ मैं,
तुम जो कभी कहती, तो बेहिचक मर जाता।

वो जो कल ठिठुरकर मर गया सड़क पर,
आप ही कहिए, अगर जाता, तो कहाँ जाता ?

डर नहीं लगता मुझे तूफ़ानी हवाओं से,
मैं जो चाहता, तो किनारे पर ठहर जाता. 

ताउम्र उलझाए रखा दुनियादारी ने मुझे,
वक़्त मिला होता,तो मैं भी कुछ कर जाता।

नादान था, जो मारा गया बेकार की अकड़ में,
इल्म होता,तो वो भी ज़रा झुक जाता. 

वो शख्स जो डूब गया किनारे पर रहकर,
मझधार में आता, तो पार उतर जाता. 

9 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-03-2015) को "बदलनी होगी सोच..." (चर्चा अंक-1905) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ख़ूब...सुंदर और भावपूर्ण रचना...बधाई


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  3. बेहद भावपूर्ण...
    वो जो कल ठिठुरकर मर गया सड़क पर,
    आप ही कहिए, अगर जाता, तो कहाँ जाता ?

    सभी शेर बहुत उम्दा, बधाई.

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  4. सच है मझधार में जो आता है पार उतर ही जाता है ...
    सुन्दर है हर शेर ..

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  5. वाह, बहुत खूब। एक उम्‍दा रचना।

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  6. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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