गुरुवार, 5 मार्च 2015

१५९. पुरानी होली

पिछले साल होली में 
तुमने जो रंग डाला था,
वह अभी तक नहीं छूटा,
बल्कि और गहरा गया है. 

तुम्हारी पिचकारी में क्या जादू था 
कि मैं आज तक भीगा हुआ हूँ,
तुम्हारे हाथों से बनी गुझिया की मिठास 
अब भी मेरे मुंह में कायम है. 

रंग-सने तुम्हारे हाथों की छुअन 
मेरे गालों पर अब भी ताज़ा है,
अब भी न जाने क्यों मेरे बदन में 
एक झुरझुरी-सी महसूस होती है. 

साल भर बीत गया,
तुम तो भूल भी गई होगी 
पिछले साल की होली,
पर मुझे वह हर पल याद है. 

मुझे इंतज़ार है 
कि तुम फिर से दोहरा दो 
पिछले साल की होली,
मुझे फिर से जीनी है इस बार 
वही पुरानी होली. 

6 टिप्‍पणियां:

  1. रंगों के महापर्व होली की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-03-2015) को "भेद-भाव को मेटता होली का त्यौहार" { चर्चा अंक-1910 } पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. प्रेम के रंग में रची रचना ..सुन्दर और भावपूर्ण

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  3. जब प्रेम का पक्का रंग लग जाए तो उसकी आदत हो जाती है ... फिर उसी रंग की चाहत हिलोरे लेती है ...

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  4. बहुत ही सुंदर भावों से सजी रचना।

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