शुक्रवार, 13 मार्च 2015

१६०.रास्ते


सीधे-सपाट रास्तों पर चलना 
मुझे अच्छा नहीं लगता,
ऊबड़-खाबड़, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर 
चलने का मज़ा ही कुछ और है. 

ऐसे रास्तों पर चलकर लगता है 
कि चलना हो रहा है,
सपाट रास्तों पर तो लगता है 
कि रास्ता कहीं है और हम कहीं और.

ऐसे रास्तों पर चलकर लगता है 
कि हम चल ही नहीं रहे,
लगता है कि हम तो स्थिर हैं 
और रास्ता है, जो चल रहा है.

9 टिप्‍पणियां:

  1. सही है, कठिनाइयों से लड़कर जो विजय मिलती है उसका अपना अलग आनंद होता है। बहुत सुन्दर रचना ....

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-03-2015) को "ख्वाबों में आया राम-राज्य" (चर्चा अंक - 1918) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. जी ये राहें जीवन की अबूझ पहेली ही तो हैं सुन्दर
    भ्रमर ५

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  4. बहुत सही कहा .... अनुपम भाव संयोजन

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  5. रास्ते भी चलते हैं ... बहुत खूब .. भावपूर्ण ...

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