बड़ी सुहानी सुबह है आज,
रज़ाई थोड़ी कुनकुनी सी है,
अभी अभी खुली है नींद,
पर आज नहीं बजा अलार्म।
पंछी चहचहा रहे हैं कहीं,
आवाज़ लगा रहा है दूधवाला,
कमरे में बिखरने को बेताब है
मोटे परदे के पार की धूप।
उबल रही है चाय पतीले में,
ख़ुशबू फैल रही है घर भर में,
रबर से बंधा पड़ा है अख़बार,
बाल्टी भर रही है गुसलखाने में।
यहीं कहीं पड़ा होगा ब्रीफ़केस,
बिख़रे होंगे टिफिन के डिब्बे,
कोई डर नहीं है आज मुझे
किसी बायोमिट्रिक मशीन का।
रज़ाई थोड़ी कुनकुनी सी है,
अभी अभी खुली है नींद,
पर आज नहीं बजा अलार्म।
पंछी चहचहा रहे हैं कहीं,
आवाज़ लगा रहा है दूधवाला,
कमरे में बिखरने को बेताब है
मोटे परदे के पार की धूप।
उबल रही है चाय पतीले में,
ख़ुशबू फैल रही है घर भर में,
रबर से बंधा पड़ा है अख़बार,
बाल्टी भर रही है गुसलखाने में।
यहीं कहीं पड़ा होगा ब्रीफ़केस,
बिख़रे होंगे टिफिन के डिब्बे,
कोई डर नहीं है आज मुझे
किसी बायोमिट्रिक मशीन का।




