शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

३२५. रास्ते


रास्ते,
कहीं कच्चे, कहीं पक्के,
कहीं समतल, कहीं गढ्ढों-भरे,
कहीं सीधे, कहीं घुमावदार,
अकसर पहुँच ही जाते हैं 
किसी-न-किसी मंज़िल पर.

बस, इसी तरह चलते चलें,
गिरते-पड़ते, हाँफते-दौड़ते,
रोज़ थोड़ा-थोड़ा, 
अनवरत,
पहुँच ही जाएंगे आख़िर,
कहीं-न-कहीं,
कभी-न-कभी.

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-09-2018) को "हिन्दी की बिन्दी" (चर्चा अंक-3096) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 15 सितम्बर 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ओंकार जी

    बस, इसी तरह चलते चलें,
    गिरते-पड़ते, हाँफते-दौड़ते,
    रोज़ थोड़ा-थोड़ा,
    अनवरत,
    पहुँच ही जाएंगे आख़िर,
    कहीं-न-कहीं,
    कभी-न-कभी.

    बहुत अच्छे👌

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  4. बढ़िया, सकारात्मक सोच ही मंजिल तक ले जाती है।

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  5. राश्ते तो पहुंचे हुए ही होते हैं .... चलने वाले पहुंचे तो जीवित हो जाते हैं ...
    बहुत सुन्दर ....

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