शहर के फुटपाथ पर
जब मैं उस छोटी सी लड़की को
मां बाप के बीच सोए देखता हूं,
तो सोचता हूं,
इतनी गाड़ियों के शोर के बीच
उसे नींद कैसे आती होगी।
मां बाप के बीच सोए देखता हूं,
तो सोचता हूं,
इतनी गाड़ियों के शोर के बीच
उसे नींद कैसे आती होगी।
क्या उसे उन आंखों की पहचान होगी,
जो वहशत से घूरती होंगी उसे,
क्या सोने से पहले कुछ खाया होगा उसने,
क्या भूखे पेट उसे नींद आई होगी।
सुबह उठकर कहां जाएगी वह शौच को
कहां रहेगी वह,
जब चलने लगेंगे फुटपाथ पर लोग,
किसके भरोसे छोड़ कर जाएंगे
काम पर उसके मां बाप।
इन सब सवालों से बेखबर
वह लड़की सोई है फुटपाथ पर
और उसके चेहरे पर
एक मासूम सी मुस्कान है।
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (01-07-2018) को "करना मत विश्राम" (चर्चा अंक-3018) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर कविता . संयत और संतुलित . बिना चीर - फाड़ के सब कुछ चुपचाप कह गयी कविता . बहुत अच्छी लगी .
जवाब देंहटाएंबहुत खूब ...
जवाब देंहटाएंकितनी निश्छल ऐसी मुस्काने फैली हुयी हैं ...
इश्वर ख्याल रखे सब का ... दरिंदें चारो तरफ हैं ...
बच्ची को देख कर सचमुच मन करुणा से भर जाता है ,लेकिन लड़की हो या लड़का पहला दायित्व जन्मदाता का है कि आगत संतान के उचित पोषण के लिये लिये उनके पास उपयुक्त साधन हैं या नहीं.
जवाब देंहटाएंBeautiful!!
जवाब देंहटाएं