शनिवार, 31 मई 2014

१२८. पानी सूरज से


मत सोखो मुझे,
यहीं मिट्टी में बहने दो,
प्यासे होंठों को मेरी ज़रूरत है,
बीज प्रस्फुटित होंगे मुझसे,
हरियाली को मेरी ज़रूरत है.

मुझे नहीं जाना कहीं और,
मुझे नहीं उड़ना आसमान में,
मैं नीचे ही ठीक हूँ,
जीवन को मेरी ज़रूरत है.

चलो, नहीं मानते,तो सोख लो मुझे,
ले चलो मुझे आसमान में,
मैं वहाँ खुश नहीं रहूँगा,
इधर से उधर भटकता रहूँगा 
और जैसे ही मौका मिला,
बरस जाऊँगा,
फिर से मिट्टी में मिल जाऊँगा.

4 टिप्‍पणियां:

  1. पानी की चाह ... अपनी मिटटी को छोड़ना आसान वैसे भी नहीं होता ...

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  2. पानी क्या कुछ नहीं सीखाती हमें
    बहुत सुन्दर रचना !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-06-2014) को ""स्नेह के ये सारे शब्द" (चर्चा मंच 1631) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  4. प्रकृति प्रेम अनमोल है |

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