शुक्रवार, 13 जून 2014

१२९. सूरज



पेड़ों के पीछे से झांकता सूरज
कितना अच्छा लगता है माँ !

देखो, पत्ते हिल रहे हैं,
जैसे रोक लेना चाहते हों 
सूरज की हर किरण,
पर सूरज है कि
पत्तों से छनकर
ज़मीन को छू ही लेता है.

ठीक ही तो है,
भला क्यों मिले सूरज 
सिर्फ़ किसी एक को,
हर किसी के हिस्से में 
उसकी किरण होनी चाहिए.

बस एक बात है माँ,
जो मुझे समझ नहीं आई -
आखिर एक ही सूरज 
इतने पेड़ों के पीछे से 
कैसे झाँक लेता है ?

12 टिप्‍पणियां:

  1. यही है सृष्टि की लीला...

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  2. ...बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति !!

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  3. कैसा सहज कौतुहल है.......
    बहुत सुन्दर !!

    सादर
    अनु

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-06-2014) को "बरस जाओ अब बादल राजा" (चर्चा मंच-1644) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  5. वाह प्रतीक के माध्यम से बड़ी बात । सुन्दर रचना बधाई बन्धु।

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  6. एक रोचक कौतुहल बच्चे का लेकिन गहन अर्थ छुपाये...बहुत सुन्दर

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  7. हाँ एक ही तो सूरज नियंता है जीवन का। कृष्ण है ,सूरज ,कृष्ण पिंड है ब्लेक बॉडी है फिजिक्स में (भौतिकी शाश्त्र में ). ऊर्जित करता है धरती के हरित आँचल को ,जीवन को जगत को। आभार आपकी टिप्पणियों का।

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  8. सहज और गहन अभिव्यक्ति .... !!

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  9. गहन भाव ... एक ही सूरज जो सबमें प्रकाश पुंज बन के जल रहा है ...

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  10. कितने सरल शब्दों में सुंदर बात..

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