शुक्रवार, 20 जून 2014

१३०. आजकल

आजकल मैं कभी-कभी 
तुम्हारे बिस्तर पर लेट जाता हूँ,
मुझे लगता है, मेरी बगल में, 
मेरे साथ, तुम भी लेटे हो, 
चुपचाप...

मैं जब तुम्हारे कमरे में जाता हूँ,
मुझे तुम्हारी सांसें सुनाई देती हैं,
तुम्हारे पसंदीदा सीरियल देखता हूँ,
तो तुम्हारी हंसी सुनाई देती है.

आजकल मैं कभी-कभी 
उन पगडंडियों पर निकल पड़ता हूँ,
जहाँ तुम चला करते थे,
मुझे लगता है,
तुम मेरे साथ चल रहे हो,
बस कुछ पूछने ही वाले हो 
और मैं उत्तर देने को बेताब.

आजकल कभी-कभी 
मैं तुम्हारी पुरानी कमीज़ पहन लेता हूँ,
मुझे लगता है,
तुम मेरे बहुत करीब हो,
बिल्कुल मुझसे चिपके हुए.

अब वह पुरानी कमीज़ 
जगह-जगह से फट गई है,
उसके रंग भी उड़ गए हैं,
रफ़ू के लायक नहीं रही वह,
अब उसे पहनना संभव नहीं.

तुम परदेस क्या गए, 
वहीँ के हो गए,
सालों बीत गए तुम्हें देखे,
अब तो चले आओ.

12 टिप्‍पणियां:

  1. अपनों की यादों तो हरवक्त हमारे जेहन में चलते रहता है.. यादों की सुन्दर अभिव्यक्ति...!!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल jरविवार (22-06-2014) को "आओ हिंदी बोलें" (चर्चा मंच 1651) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. दिल को छूती बहुत भावपूर्ण रचना...

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  4. परदेशी पिया की यादों की मार्मिक अभिव्याक्ति !
    नौ रसों की जिंदगी !

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  5. chhoti chhoti bate jb hm apne priyejano ki unki yaad me duhrate hain to ek taraf jahan apne man ko sukuoon de rahe hote hain to dusri taraf swayam ko utna hi us priyejan ke liye tadfa bhi rahe hote hain. ajeeb sangam hai ye khushi aur vireh ka jo aapne shabdo ki chhoti kirchano me poorn roop se samet diya hai.

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  6. मित्रता की खुशबू झलकती है इस कविता की हर पंक्ति में...

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  7. सुन्दर रचना...बहुत खूब...

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  8. मार्मिक रचना, अपनों क बिछोह यूँ ही दर्द देता है.

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