शनिवार, 2 मार्च 2013

७०.अनलिखा-अनकहा

जो लिख दिया गया,जो कह दिया गया,
वह लेखों में,स्मृतियों में है.

फिर भी बहुत कुछ है,जो अनलिखा है,
बहुत कुछ है,जो अनकहा है.
अनलिखे को तलाश है लिखनेवाले की 
और अनकहे को कहनेवाले की.

कभी न कभी अनलिखे को लिखनेवाला, 
अनकहे को कहनेवाला मिल ही जायेगा.
जो अनलिखा है,लिख दिया जाएगा,
जो अनकहा है,कह दिया जाएगा.

जब सब कुछ लिख दिया जाएगा,
तब भी कुछ नया होगा,जो अनलिखा होगा,
जब सब कुछ कह दिया जाएगा,
तब भी कुछ नया होगा, जो अनकहा होगा.
ऐसा कभी नहीं होगा 
कि कुछ भी अनलिखा न रहे,
कुछ भी अनकहा न रहे.

अनलिखे को लिखनेवाले,
लिखनेवालों को अनलिखा,
अनकहे को कहनेवाले,
कहनेवालों को अनकहा,
कभी निराश नहीं करते.

4 टिप्‍पणियां:

  1. अनलिखे को लिखनेवाले,
    लिखनेवालों को अनलिखा,
    अनकहे को कहनेवाले,
    कहनेवालों को अनकहा,
    कभी निराश नहीं करते.

    ...बिल्कुल सच कहा है...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  2. अनलिखे को लिखनेवाले,
    लिखनेवालों को अनलिखा,
    अनकहे को कहनेवाले,
    कहनेवालों को अनकहा,
    कभी निराश नहीं करते.,,,,

    बहुत सुंदर अर्थपूर्ण रचना,,,,

    RECENT POST: पिता.

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  3. बहुत ही सुन्दर लिखा है
    बहुत ही बढ़ियाँ रचना...
    :-)

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