शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

६९.आदर्श

मुझे नहीं बनना तुम्हारा आदर्श.

मैं बस मैं बना रहना चाहता हूँ,
वह नहीं जो तुम सोचते हो कि मैं हूँ,
मेरी कमजोरियां सामने आने दो,
थोड़ा-सा मोहभंग हो जाने दो,
मैं चाहता हूँ थोड़ा बेशर्म बनना,
थोड़ी बेहूदा हरकतें करना,
थोड़ा झूठ बोलना, लड़ना- झगड़ना,
नाराज़ होना, बदला लेना,
पीठ पीछे थोड़ी बुराई करना.

तोड़ डालो वह छवि,
जो मेरी तुम्हारे मन में है,
मुझे देखो,समझो,जानो,
मैं भी औरों की तरह 
एक ओछा-सा इंसान हूँ 
और इसी में खुश हूँ.

मुझे मत बनाओ भगवान,
मत करो अपेक्षाओं में क़ैद,
मुझे ज़रा सांस लेने दो,
मुझे ज़रा जीने दो,
मुझे नहीं बनना तुम्हारा आदर्श,
मुझे नहीं बनना किसी का भी आदर्श.

3 टिप्‍पणियां:

  1. इंसान बने रहना आसान है....
    सीधा सरल आम सा इंसान....

    बहुत सच्ची रचना.

    सादर
    अनु

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