शनिवार, 9 मार्च 2013

७१.पतझड़

पतझड़, बड़े बेशर्म हो तुम.

हर साल चले आते हो मुंह उठाए,
पत्तों को पेड़ों से गिराने,
कलियों-फूलों को मिटाने,
परिंदों से उनके घोंसले छीनने,
बगिया को तहस-नहस करने.

पतझड़, तुम्हें क्यों नहीं सुहाती 
पत्तों की हरितिमा,
कलियों का सौंदर्य,
फूलों की खुशबू ?
चहचहाते परिंदों से 
क्या दुश्मनी है तुम्हारी?
क्या मिलता है तुम्हें 
पेड़ों को ठूंठ बनाकर?
हँसता-खिलखिलाता जीवन 
तुम्हें क्यों रास नहीं आता?

हर बार वसंत आता है,
खदेड़ भगाता है तुम्हें,
फिर निकल आते हैं हरे-हरे पत्ते,
फिर खिल जाती हैं कलियाँ,
फिर मुस्करा उठते हैं फूल,
फिर चहचहाने लगते हैं परिंदे.

पर तुम बाज़ नहीं आते,
घात लगाए बैठे रहते हो,
मौका मिलते ही फिर से 
बोल देते हो हमला.

पतझड़, इतने बेशर्म 
इतने निष्ठुर मत बनो,
कभी तो उस उत्सव का हिस्सा बनो,
जिसका विध्वंस करने 
तुम हर साल चले आते हो.

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !!! बहुत उम्दा अभिव्यक्ति सुंदर रचना ,,, ओंकार जी,बधाई,

    Recent post: रंग गुलाल है यारो,

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  2. पतझड़ के बाद बसंत कितना अच्छा लगता है
    बिलकुल वैसे ही जैसे दुःख के बाद सुख ....

    सुन्दर रचना ,,,

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  3. दिनांक 11/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. पतझड़, इतने बेशर्म
    इतने निष्ठुर मत बनो,
    कभी तो उस उत्सव का हिस्सा बनो,
    जिसका विध्वंस करने
    तुम हर साल चले आते हो.

    क्या करें यह बाज़ नहीं आता ......:))

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  5. सदियाँ हो गयीं पतझड़ से ये विनती करते ....सुनता कहाँ है ये किसी की .....बहुत बढिया रचना

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  6. पर तुम बाज़ नहीं आते,
    घात लगाए बैठे रहते हो,
    मौका मिलते ही फिर से
    बोल देते हो हमला.---waah vartman ka sach rachna ke madhyam se

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