शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

२३६. मछली



मैं कूद रही थी पानी में,
तैर रही थी बिना रुके,
इधर से उधर,
जहाँ भी मेरा मन किया,
मुझे लगा  
कि ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है,
जैसे पूरी दुनिया 
मेरे लिए ही बनी थी,
पर न जाने कब 
मैं जाल में फंस गई,
जाल, जो मेरे लिए ही 
किसी ने बिछा रखा था.
बहुत हाथ-पांव मारे मैंने,
बहुत तड़पी, बहुत चिल्लाई,
पर निकल नहीं पाई,
न ही जाल तोड़ पाई.
मैं क्यों सोच नहीं पाई 
कि जाल बिछानेवाले 
कमज़ोर हो सकते हैं,
पर जाल बहुत मजबूत होता है ?

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