शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

२००. प्रेम कविता

मैं नहीं चाहता 
कि कोई जाने 
तुम्हारे बारे में,
हमारे बारे में 
और इस बारे में 
कि तुम मेरे लिए क्या हो.

उस चाहत का,
जिससे लोग अंजान हों,
मज़ा ही कुछ और है,
जैसे दो किनारे साथ-साथ 
मीलों तक चलते रहें 
और नदी को पता भी न चले.

सुनो, कोई नहीं जानता 
कि सालों पहले मैंने 
जो कविता लिखी थी,
वह दरअसल एक प्रेम कविता थी 
और उसकी पंक्तियों के बीच 
मैंने तुम्हें कहीं छिपाया था.

बहुत चर्चा हुई उस कविता की,
बहुत सराहा उसे लोगों ने,
पर नहीं खोज पाए तुम्हें.

सिर्फ़ मुझे पता था 
कि वह एक प्रेम कविता थी 
और उसकी पंक्तियों के बीच 
मैंने जिसे छिपाया था,
वह कोई और नहीं,
तुम थी.

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-01-2016) को "सुब्हान तेरी कुदरत" (चर्चा अंक-2224) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार! मकर संक्रान्ति पर्व की शुभकामनाएँ!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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  3. बहुत सुंदर शब्दों से भावो को सजाया है ।

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  4. waah...
    सिर्फ़ मुझे पता था
    कि वह एक प्रेम कविता थी

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  5. बहुत सुंदर भाई .... अच्छी कविता ...

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  6. प्रेम से परिपूर्ण कविता.
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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  7. प्रेम के कोमल अहसासों की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  8. शामिले प्रेम का मीठा एहसास ...

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