शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

१८०. क्षितिज



क्षितिज वह जगह है
जहाँ धरती और आकाश
मिलते नहीं हैं,
पर मिलते से लगते हैं.

हम सब चाहते हैं
कि धरती और आकाश मिलें,
उनकी युगों-युगों की कामना
पूरी हो जाय,
उनकी तपस्या का उन्हें
फल मिल जाय.

अंतस की गहराइयों से
जो हम देखना चाहते हैं,
हमारी आँखें हमें
वही दिखाती हैं.

इसलिए हमें लगता है
कि धरती और आकाश
दूर कहीं मिल रहे हैं,
जबकि वे मिलते नहीं हैं,
वे कभी मिल ही नहीं सकते.

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-08-2015) को "समस्याओं के चक्रव्यूह में देश" (चर्चा अंक-2076) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर व सार्थक रचना ..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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  3. गहरा भाव लिए ... कई बार आभास मिलन का काफी होता है क्षितिज को देख कर ...

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  4. हाँ यह सत्य हैं कुछ चीजें कभी नहीं मिल पाती.............
    http://savanxxx.blogspot.in

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  5. बहुत सुंदर कविता .... बहुत से रिश्ते ऐसे ही होते हैं... क्षितिज जैसे ... धरती आकाश जैसे...
    www.vairagidalip.blogspot.in

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