शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

१७९. आईने में मैं

कई चेहरे मैंने देखे आईने में,
सब वहां मौजूद थे,
सब पहचाने थे,
सिवाय एक चेहरे के 
जो न पहचाना था,
न वहां मौजूद था.

बड़ी कोशिश की मैंने,
बहुत ज़ोर डाला दिमाग पर,
पर नहीं पहचान पाया 
वह अनजाना चेहरा. 

थक-हारकर मुझे 
पूछना पड़ा किसी से,
' यह अनजाना चेहरा, 
जो दिख रहा है आईने में,
किसका है ?'
वह हंसा, बोला, 'तुम्हारा'.  

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर.स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं !
    नई पोस्ट : झूठे सपने

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  2. बहुत गहन और उम्दा प्रस्तुति...सच में समय के साथ हम स्वयं से कितने अनजान हो जाते हैं...

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  3. HAPPY INDEPENDENCE DAY
    सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  4. ' यह अनजाना चेहरा,
    जो दिख रहा है आईने में,
    किसका है ?'
    वह हंसा, बोला, 'तुम्हारा'.

    यह भी कहना मुश्किल है. बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  5. दिनांक 17/08/2015 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
    चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर...
    आप भी आयेगा....
    धन्यवाद...

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  6. कभी -कभी हम खुद को ही नहीं पहचान पाते ... बहुत अच्छी कविता
    http://savanxxx.blogspot.in

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  7. खुद को पहचानना कई बार आसान नहीं होता ... भाव पूर्ण ...

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