शुक्रवार, 22 मई 2015

१७०. बेड़ियाँ

न जाने कब से मैं 
खोल रहा हूँ बेड़ियाँ,
पर एक खोलता हूँ,
तो दूसरी लग जाती है.

तरह-तरह की बेड़ियाँ,
अनगिनत बेड़ियाँ -
कभी अहम की,
कभी पूर्वाग्रह की,
कभी स्वार्थ की,
कभी लालच की,
कभी झूठ की,
कभी घृणा की.

दरअसल ये बेड़ियाँ 
मैंने खुद ही बनाई हैं,
खुद को ही पहनाई हैं,
ये बेड़ियाँ मैं 
खुद ही खोलता हूँ 
और खुद ही लगाता हूँ.

दरअसल ये बेड़ियाँ 
अब मेरी ज़रूरत नहीं,
मेरी आदत बन गई हैं.

7 टिप्‍पणियां:

  1. भावपूर्ण एव हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति।मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-05-2015) को "माँगकर सम्मान पाने का चलन देखा यहाँ" {चर्चा - 1985} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. बहुत उम्दा कविता |
    मेरी ब्लॉग पर 'इंतज़ार' कविता पढ़ें ।
    http://merisyahikerang.blogspot.in/2015/05/blog-post_25.html

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  4. आदत से छुटकारा भी इंसान खुद ही पा सकता है .. हिम्मत चाहिए ...
    सत्य लिखा है आपने ...

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  5. par is atma bodh tak pahunchna bhi.. bahut uplabdhi hai.. ab kadachit toot hi jayengi bediyaan..

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