शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

१४१. दूर से

दूर आसमान में टिमटिमाता 
छोटा-सा सितारा 
मुझे अपनी ओर खींचता है.

मेरा मन करता है 
कि तेज़ हवाएं चलें,
मुझे उड़ा ले जायं 
वहाँ, जहाँ वह सितारा है.

या फिर मैं बादलों के साथ 
भटकता रहूँ इधर से उधर,
ज़रा नज़दीक से देखूं सितारे को.

पर फिर मुझे लगता है 
कि मैं यहीं ठीक हूँ,
यहीं, ज़मीन पर,
सितारे से बहुत दूर,
क्योंकि दूर से जो चीज़
बहुत अच्छी लगती है,
पास से अकसर वैसी नहीं लगती.

अब तो मैं  यही चाहता हूँ  
कि हमेशा ज़मीन से 
देखता रहूँ सितारे को, 
मेरी यह सोच कभी न बदले 
कि वह सितारा 
जो आसमान में चमक रहा है 
कितना सुंदर है !

6 टिप्‍पणियां:

  1. एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। बेहद उम्दा रचना
    Rohitas Ghorela: सब थे उसकी मौत पर (ग़जल 2)

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  2. पैर जमी पे रहे और नजर सितारे पर! .......बहुत खूब।

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  3. भाव प्रवण रचना जो दिल को छू गई। मेरे पोस्ट पर आपका आमंत्रण है।सुप्रभात।

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  4. यथार्थ का कडुआ पन मीठा लगे .. ऐसा प्रयास करती है रचना ... लाजवाब भाव ...

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