शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

१४२. दिया, हवाओं से


हवाओं, ज़रा धीरे बहो.

अभी बाती बची है मुझमें,
थोड़ा तेल भी शेष है,
सुबह होने में देर है अभी,
मुझे तनिक और जलने दो.

अगर नहीं मानना तुम्हें,
तो कर लो अपनी मर्ज़ी,
लगा लो पूरा ज़ोर,
देखना, कहीं से आएंगी,
दो कोमल हथेलियाँ,
ढांप लेंगी मेरी लौ,
बेबस कर देंगी तुम्हें.

फिर तुम कितना भी तेज़ बहो,
कितना भी ज़ोर लगा लो,
मैं बुझूंगा नहीं,
फिर तो जब तक मुझमें
बाती रहेगी, तेल रहेगा,
जब तक मैं रहूँगा,
मैं जलता रहूँगा.

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (20-10-2014) को "तुम ठीक तो हो ना.... ?" (चर्चा मंच-1772) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. हौसले में बहुत ताकत होती है …सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. Bilkul housala hai to tufaan se bhi lada ja sakta hai ...umda prastuti !!

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  4. भावपूर्ण प्रस्तुति.
    दिया और बाती जब साथ-साथ हों और अपनो की छांव हो
    तो तूफानों से भी निकला जा सकता है.

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  5. दो कोमल हाथों का दामन मिल जाए तो जोंदगी भर जला जा सकता है ...
    आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें ...

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  6. बहुत हि सुंदर , ओंकार सर धन्यवाद !

    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 23 . 10 . 2014 दिन गुरुवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !
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  7. अनुपम प्रस्तुति....आपको और समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं

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  8. ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति… दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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