शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

१३७. नाटक

बहुत दिन हो गए,
चलो, एक बार फिर 
तुम्हारा हाथ मरोड़ दूं,
बस उतना ही 
कि तुम्हें दर्द न हो,
पर तुम दर्द होने का 
नाटक कर सको.

मैं तुरंत छोड़ दूं तुम्हारा हाथ 
और तुम नाटक कर सको  
मुझसे रूठ जाने का.

मैं तुम्हें मनाऊँ 
और तुम नाटक करो 
न मानने का.
तुम्हारे रूठे रहने पर 
मैं तुमसे रूठने का नाटक करूँ
और घबराकर तुम मुझे मनाओ.

बचपना क्या छोड़ा 
अजनबी हो गए हम,
चलो, कुछ बचकानी हरकतें करें,
थोड़ा-सा नाटक करें,
साथ-साथ चलने के लिए 
थोड़ा बचपना, थोड़ा नाटक 
बहुत ज़रुरी है.

13 टिप्‍पणियां:

  1. बचपना क्या छोड़ा
    अजनबी हो गए हम,
    चलो, कुछ बचकानी हरकतें करें,
    थोड़ा-सा नाटक करें,
    साथ-साथ चलने के लिए
    थोड़ा बचपना, थोड़ा नाटक
    बहुत ज़रुरी है........ बहुत खूब .बधाई आपको

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  2. बहुत प्यारी सी कविता..........

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  3. सुन्दर भाव अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति आज के बासा रूटीन तोड़ती हुई शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का।

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  4. अर्थपूर्ण ... जरूरी है चाहे नाटक ही सही उस दुनिया में लौट आना ....

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  5. ये बचपना कब हमारी ज़िन्दगी से छूट जाता है, पता ही न चलता. बहुत भावपूर्ण रचना, बधाई.

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