शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

१३६. किनारा लहरों से



लहरों, मुझसे अठखेलियाँ मत करो.

तुम अचानक उछलकर आती हो,
मुझे आलिंगन में जकड़कर
गहरे तक भिगो जाती हो,
जब तक मैं कुछ समझ पाऊँ,
तुम फिर समंदर में खो जाती हो.

खुद को किसी तरह समझाकर 
मैं अलगाव को स्वीकारता हूँ,
पर मेरी भावनाओं से खेलने 
तुम फिर चली आती हो.

लहरों, मुझे बख्श दो,
भ्रमित मत करो मुझे,
मैं खेल का सामान नहीं हूँ,
स्थिर हूँ,स्थिरता चाहता हूँ.

तय करो कि तुम्हें क्या करना है,
अगर आना है तो आ जाओ,
अगर आकर चले जाना है,
तो बेहतर है कि मुझे अकेला छोड़ दो.

15 टिप्‍पणियां:

  1. लहरें और स्थिरता -असंभव : लहरों के बीच खड़ा रहने के लिए स्वयं की मज़बूती अपेक्षित है!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  3. आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 25 . 8 . 2014 दिन सोमवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  4. कहाँ संभव होता है लहरों में स्थिरता पाना? बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  5. सुन्दर प्रस्तुति लहरें और जल और भंवर सब एक ही हैं पृथक मेरा मन है। पर मैं मन नहीं हूँ। मन भौतिक ऊर्जा मटीरियल एनर्जी का बना है मैं हूँ डिवाइन एनर्जी का एक क्वांटम

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  6. वाआह्ह्ह ओंकार जी वाह बहुत सुन्दर कृति

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  7. वाह बहुत खूब । सुन्दर है ।।

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  8. मनोभावों को सुन्दरता से प्रस्तुत किया1

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