रविवार, 7 सितंबर 2014

१३८. पसंद और प्यार

तुम्हारे हाव-भाव,
तौर-तरीके,चाल-ढाल,
मुझे बिल्कुल पसंद नहीं,
मैं आँखें बंद करके सोचूँ,
तो कुछ भी ऐसा नहीं दिखता,
जो मैं तुममें पसंद कर सकूं,
पर न जाने क्यों,
तुम्हारा दुःख मुझसे 
सहा नहीं जाता,
तुम्हारी थोड़ी-सी तकलीफ़
मुझे बेचैन कर देती है,
न जाने क्यों  
मुझे हर वक्त 
तुम्हारा ख्याल रहता है.

कभी-कभी मैं सोचता हूँ,
काश, मैं तुम्हें प्यार नहीं करता,
जैसे कि मैं तुम्हें पसंद नहीं करता.

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 10 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रेम और पसंद अलग अलग ... तभी तो ये काश की दिवार है बीच में ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्यार और विरोधाभास दोनों एक जगह ... कमाल है .... है ना :)

    स्वागत है मेरी नवीनतम कविता पर रंगरूट
    अच्छा लगे तो ज्वाइन भी करें
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर चित्र तादात्म्य और द्व्न्द्व का।

    उत्तर देंहटाएं