शनिवार, 23 नवंबर 2013

१०५. दीया

हवाओं,
मेरे बुझने पर मत इतराओ,
अभी मेरा अंत नहीं हुआ है.

अभी मुझमें थोड़ा तेल बाकी है,
अधजली बाती अभी शेष है,
मुझे इंतज़ार है बस एक लौ का
जो मुझे फिर से प्रज्जवलित करे.

मेरी बाती जलकर राख हो जाय 
तो भी मेरा अंत नहीं होगा,
तेल खत्म हो जाय, तो भी नहीं,
नई बाती, थोड़ा तेल और एक लौ,
बस, मैं फिर जल उठूँगा.

हवाओं,
विजय का जश्न मत मनाओ,
मैं बुझा हूँ, हारा नहीं हूँ,
मुझे हराने के लिए 
तुम्हें मुझे तोड़ना होगा.

यह सच है 
कि मैं मिट्टी से बना हूँ,
छोटा और कमज़ोर लगता हूँ,
पर मुझे तोड़ना आसान नहीं है,
मुझे तोड़ने के लिए तुम्हें
थोड़ा और ज़ोर लगाना होगा,
मुझे तोड़ने के लिए तुम्हें
थोड़ा और तेज़ बहना होगा.

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार को (24-11-2013) बुझ ना जाए आशाओं की डिभरी ........चर्चामंच के 1440 अंक में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत खूब ... उभरती इच्छा, जीने का जज्बा, कुछ करने की चाह ... कभी मरती नहीं है ...
    प्रभावी रचना ...

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  3. बिल्कुल सही..... यह सच है कि मैं मिटटी से बना हूँ... कमजोर लगता हूँ ..पर मुझे तोड़ना आसान नहीं... बहुत सुंदर रचना .....!!

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  4. बहुत प्रेरणादायक है आपकी कविता..

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  5. मुझे हराने के लिए
    तुम्हें मुझे तोड़ना होगा.

    जो आसान नहीं !!

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