शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

३३५.सुख

आज बहुत ख़ुश हूँ मैं.

लम्बी अँधेरी रात में 
रौशनी दिखी है कहीं,
नीरव घने जंगल में 
कोई चिड़िया चहचहाई है,
भटके हुए राही को 
दिखी है कोई पगडंडी,
घने काले बादलों में 
कोई बिजली चमकी है. 

आज बहुत ख़ुश हूँ मैं,
सालों की यंत्रणा के बाद 
आज मेरी मुट्ठी में आया है 
गेहूं के दाने जितना सुख.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-12-2018) को "अनोखा संस्मरण" (चर्चा अंक-3173) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुख सुख ही होता है, एक दाने भर या मुट्ठी भर..सुन्दर रचना...

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  3. सुख कम हो ज्यादा ... बहुत है जिंदगी के लिए ...

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  4. बहुत बढ़िया, अत्ति सुंदर ! जारी रखे ! Horror Stories

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  5. बहुत अच्छा लिखा है। ऐसे ही लिखते रहिए। हिंदी में कुछ रोचक ख़बरें पड़ने के लिए आप Top Fibe पर भी विजिट कर सकते हैं

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