शनिवार, 24 नवंबर 2018

३३४. पिंजरा


पिंजरे में रहते-रहते 
अब चाह नहीं रही 
कि आज़ाद हो जाऊं,
खुले आसमान में उड़ूँ,
देखूं कि मेरे पंखों में 
जान बची भी है या नहीं।

अब हर वक़्त मुझे 
घेरे रहती है चिंता 
कि हवा जो पिंजरे में आ रही है,
कहीं रुक न जाए,
दाना जो रोज़ मिल रहा है,
कहीं बंद न हो जाए,
मिलता रहे मुझे अनवरत 
बस चोंचभर पानी।

अब छोटा हो गया है
मेरी ख़्वाहिशों का दायरा,
न जाने अब मैं क्या हूँ,
पर पंछी तो बिल्कुल नहीं हूँ.

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-11-2018) को "सेंक रहे हैं धूप" (चर्चा अंक-3166) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 24/11/2018 की बुलेटिन, " सब से तेज़ - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. 'नोन-तेल-लकड़ी' की फ़िक्र हममें से बहुतों की उड़ान रोक देती है, पंख क़तर देती है.

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  4. पराधीनता की व्यथा पर हृदयस्पर्शी सृजन ।

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  5. बहुत खूब। ऐसे ही हम भी हैं। बस पैसे आते रहें इसीलिए सहते रहते हैं।

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  6. दर्द या जीने की मजबूरी ...
    पंची शायद बस माध्यम है शब्दों का ...

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