गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

309. इंसान

वह आदमी,
जिससे मैं सुबह मिला था,
कमाल का इंसान था,
बड़ा दयावान,
बड़ा संवेदनशील,
किसी का बुरा न करनेवाला,
किसी का बुरा न चाहनेवाला,
सब की खुशी में खुश,
सबके दुख में दुखी.

वही आदमी जब शाम को मिला,
तो बदला हुआ था,
निहायत घटिया किस्म का,
दूसरों के दर्द से बेपरवाह,
स्वार्थी, संवेदनहीन,
पीठ में छुरा भोंकनेवाला।

मैं सोचता हूँ,
सुबह का इंसान 
शाम तक अमानुष कैसे बन जाता है,
सचमुच आसान नहीं होता 
इन्सानों को समझना. 

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (28-04-2017) को "यह समुद्र नहीं, शारदा सागर है" (चर्चा अंक-2954) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. हर शब्द अपनी दास्ताँ बयां कर रहा है आगे कुछ कहने की गुंजाईश ही कहाँ है बधाई स्वीकारें
    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति :)
    बहुत दिनों बाद आना हुआ ब्लॉग पर प्रणाम स्वीकार करें

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 29 एप्रिल 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. सही कहा है,विषम सामाजिक परिस्थितियाँ इंसान के नैतिक मूल्यों का कत्ल कर देती हैं। बहुत ही कम बचते हैं जो अपने मूल्यों पर कायम रह पाते हैं।

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  5. हर चहरे पर कितने चहरे लगे रहते हैं
    आज की सच्चाई है ये।

    बहुत अच्छी रचना

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  6. तभी तो वो इंसान है ... वर्ना गिरगिट का भी पता चल जाता है जब वो रंग बदलती है ... पर इंसान ...

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