शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

२३८.ज़मीन


लहरों, बहुत हो गया खेल-कूद,
बहुत हो गई मस्ती,
बहुत घुमा दिया तुमने मुझे 
बीच समुद्र में,
अब मुझे किनारे पर ले चलो.

चाहो तो पटक दो मुझे
चट्टानों के ऊपर,
पर महसूस करने दो मुझे 
पांवों के नीचे 
ज़मीन के होने का सुख.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-12-2016) को "ये भी मुमकिन है वक़्त करवट बदले" (चर्चा अंक-2546) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 04 दिसम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बहुत ख़ूब .. ज़मीन की ख़ुशबू लौटने पे मजबूर कर देती है

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  4. अब मुझे किनारे पर ले चलो..
    सुंदर भाव.

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  5. वाह ! सुन्दर एवं ईमानदार अभिव्यक्ति !

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