शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

१९७. क़ानून

मैं नहीं मानता 
कि क़ानून अँधा होता है. 
क़ानून बनानेवाले जानते हैं 
कि किसके लिए 
कैसा क़ानून बनाना है,
लागू करनेवाले जानते हैं 
कि किसके मामले में 
कैसे लागू करना है,
व्याख्या करनेवाले जानते हैं 
कि किस व्यक्ति के लिए 
क़ानून का क्या अर्थ होता है.

जिसे क़ानून की ज़रूरत 
सबसे ज़्यादा होती है,
बस वही नहीं जानता 
कि क़ानून क्या होता है,
उसे लागू कौन करता है,
कैसे करता है,
कि उसकी व्याख्या भी होती है.

क़ानून अँधा नहीं होता,
दरअसल जिसे क़ानून की 
सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है,
वह अँधा होता है. 

7 टिप्‍पणियां:

  1. जय मां हाटेशवरी....
    आप ने लिखा...
    कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
    हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
    दिनांक 27/12/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की जा रही है...
    इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
    टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    कुलदीप ठाकुर...

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  2. समसामयिक और विचारणीय अभिव्यक्ति ।

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  3. बेहद प्रभावशाली सोच......बहुत बहुत बधाई.....

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  4. बहुत सुन्दर रचना
    आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!

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