शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

१८६. भीड़ में मैं

मैं जब भीड़ में होता हूँ,
तो मैं नहीं रहता,
बिल्कुल बदल जाता हूँ.

अकेले में मैं शांत हूँ,
पर भीड़ में हिंसक हो जाता हूँ,
गन्दी गालियां बक सकता हूँ,
हाथापाई कर सकता हूँ,
पत्थर फेंक सकता हूँ,
यहाँ तक कि किसी की
जान भी ले सकता हूँ.

अकेले में मुझे परवाह नहीं
नैतिकता और सिद्धांतों की,
पर भीड़ में बुराइयों के ख़िलाफ़
जमकर आवाज़ उठाता हूँ,

अकेले में नहीं सोचता मैं 
न्याय-अन्याय के बारे में,
पर भीड़ में खूब चिल्लाता हूँ 
उस अन्याय के ख़िलाफ़ भी 
जो मैं हर रोज़ करता हूँ. 

मैं अकेले में कुछ होता हूँ,
भीड़ में कुछ और,
मैं जो भीड़ में होता हूँ,
उस पर कभी मुझे शर्म आती है,
तो कभी गर्व होता है.

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-10-2015) को "पतंजलि तो खुश हो रहे होंगे" (चर्चा अंक-2126) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मैं और एयरटेल 4G वाली लड़की - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. भीड़ के मनोविज्ञान को बखूबी रेखांकित करती कविता... !!

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  4. मैं जो भीड़ में होता हूँ,
    उस पर कभी मुझे शर्म आती है,
    तो कभी गर्व होता है.
    … सच कहा भीड़ जब उन्माद पर उतर आती है तो नफा-नुकसान का अनुमान लगाना उसके बूते से बाहर हो जाता है. उस समय उसका हिस्सा बनकर शर्म अानी लाज़मी है .और जब जुर्म की खिलाफ एक साथ आवाज उठे और उसका सकारात्मक परिणाम सामने आये तो गर्व तो होगा ही। ।
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति .

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  5. मैं अकेले में कुछ होता हूँ,
    भीड़ में कुछ और,
    मैं जो भीड़ में होता हूँ,
    उस पर कभी मुझे शर्म आती है,
    तो कभी गर्व होता है.
    बहुत सुन्दर भाव है इन पक्तियों में।

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