शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

१८२. अधबना मकान

हमारा प्यार 
जैसे अधबना मकान,
ईंट-ईंट जोड़ी,
दीवारें बनाईं,
सीमेंट,सरिया,
बजरी-रोड़ी,
न जाने क्या-क्या मिलाया,
तब जाकर बना 
यह अधबना मकान। 

फिर क्यों हार मान ली,
क्यों छोड़ दिया अधूरा, 
थोड़ी-सी कोशिश करते 
तो पूरा हो जाता,
घर बन जाता यह 
अधबना मकान. 

अगर अधूरा ही छोड़ना था,
तो शुरू हो क्यों किया ?
जिधर मंज़िल ही नहीं थी,
उधर चले ही क्यों ?
क्यों देखे हमने रंगीन सपने 
जब करना ही नहीं था हमें 
गृह-प्रवेश… 


6 टिप्‍पणियां:

  1. अधूरे सपने को बहुत सुंदर लाइनो से पूरा किया है आपने । बहुत खूब |

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  2. सुन्दर व सार्थक रचना ..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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  3. प्यार खुद के शुरू करने से कहाँ होता है ... अपने आप शुरू ह जाता है ...

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  4. दिल को छूते अहसास...बहुत भावपूर्ण रचना...

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  5. अच्छा सवाल..... उठाती कविता
    http://savanxxx.blogspot.in

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