रविवार, 30 नवंबर 2014

१४६. पुराने खत

इस  बार तो हद कर दी तुमने,
अपने पुराने खत वापस मांग लिए,
पर ऐसी कई चीज़ें हैं,
जो न तुम मांग सकती हो,
न मैं दे सकता हूँ. 

भीड़ में नज़रें बचाकर 
मेरी ओर उठतीं तुम्हारी निगाहें,
डरी-डरी सी तुम्हारी मुस्कराहटें,
मेरी ओर बढ़ते तुम्हारे ठहरे-से कदम
तुम्हारे कपड़ों की सरसराहट,
तुम्हारी उँगलियों की छुअन -
सब कुछ अब भी मेरे पास है,
तुम्हारे खतों से ज़्यादा महफ़ूज़. 

इसलिए कहता हूँ,
क्या करोगी खत वापस लेकर,
इन्हें मेरे पास ही रहने दो,
उन तमाम यादों की तरह,
जो मैं चाहूँ भी 
तो तुम्हें लौटा नहीं सकता.

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-12-2014) को "ना रही बुलबुल, ना उसका तराना" (चर्चा-1814) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कहाँ आसान होता है सब कुछ लौटा देना .. क्या यादें भी लौटाई जा सकती हैं ...

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  3. प्रेम के कोमल अहसासों की बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति....

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