शनिवार, 15 नवंबर 2014

१४५. कविता से

कविता, आजकल मैं उदास हूँ,
बहुत दिन बीत गए,
पर तुम आई ही नहीं.

तुम्हें याद हैं न वे दिन,
जब तुम कभी भी आ जाती थी -
मुंह-अँधेरे, दोपहर, शाम - कभी भी,
मुझे सोते से भी उठा देती थी,
जब सारे ज़रुरी काम छोड़कर 
मुझे तुम्हारा साथ देना पड़ता था,
वरना तुम रूठ जाती थी,
मुझे भी तो बहुत भाता था
सब कुछ भूल कर तुम्हारे साथ हो लेना.

देखो, आज फिर से  
मैं कलम-क़ागज़ लेकर तैयार हूँ,
भूल भी जाओ गिले-शिकवे,
पहले की तरह एक बार फिर 
मेरे पास दौड़ी चली आओ.

मेरी उदासी दूर करो, कविता, 
तुम्हें पुराने दिनों का वास्ता.

10 टिप्‍पणियां:

  1. आखिर दिल की बात समझती है कविता ..
    ..बहुत बढ़िया ..

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-11-2014) को "वक़्त की नफ़ासत" {चर्चामंच अंक-1800} पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. कविता रूठ जाती है कभी ... समझ नहीं आता क्यों ...
    लाजवाब भाव लिए शब्द ...

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  4. मुझे तुम्हारा साथ देना पड़ता था,
    वरना तुम रूठ जाती थी,
    मुझे भी तो बहुत भाता था
    सब कुछ भूल कर तुम्हारे साथ हो लेना.
    प्रिय ओंकार जी
    स्नेहिल संसार के सुन्दर जज्बात ...मन को रमने वाला
    बधाई
    भ्रमर ५

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  5. सच, कविता भी कभी कभी रूठ जाती है. सुन्दर भाव, बधाई.

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