शनिवार, 7 दिसंबर 2013

१०७. त्याग

आओ, बाँट ले आपस में 
घर का सारा सामान.

कर लें खेत के तीन टुकड़े-
पूरबवाला छोटे का,
बीचवाला मंझले का
और पश्चिमवाला मेरा.

बाँट लें घर के कमरे-
पीछेवाले मंझले के,
आंगनवाले छोटे के
और सामनेवाले मेरे.

सोना-चांदी,कांसा-पीतल,
भगोने-कड़ाही,चम्मच-कांटे,
लोहा-लक्कड़, कूड़ा-करकट,
सब कुछ बाँट लें तीन हिस्सों में.

अब बचे माँ और पिताजी,
कैसे बाँटें उन्हें तीन हिस्सों में?
चलो, माँ छोटे की,
पिताजी मंझले के,
लो, अबकी बार मैंने 
अपना हिस्सा छोड़ दिया.


14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-12-2013) को "जब तुम नही होते हो..." (चर्चा मंच : अंक-1455) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. ठीक किया
    नश्वर चीज
    को क्या लेना :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. सब बांटा जा सकता है..
    पर माता पिता को कैसे बांटे..
    भावपूर्ण रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  4. बड़ा त्याग किया अपना हिस्सा छोड़ दिया -अच्छा व्यंग
    नई पोस्ट नेता चरित्रं
    नई पोस्ट अनुभूति

    उत्तर देंहटाएं
  5. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर भावों की अभिव्यक्ति !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

    उत्तर देंहटाएं
  8. तल्ख़ ... हर कोई यही करना चाहता है आज ... संवेदनशील ... गहरी रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. कल 11/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  10. आज का यथार्थ...बहुत सटीक प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं