शनिवार, 21 दिसंबर 2013

१०९. बीट

मैंने देखा,
सड़क पर कुछ गुंडे 
छेड़ रहे थे एक बच्ची को,
रो रही थी वह,
मदद मांग रही थी मुझसे,
पर मैं चुप था,
बहुत डरा हुआ था,
हँस रहे थे गुंडे,
बेबस थी वह बच्ची.

डाल पर बैठा एक कौवा
सब कुछ देख रहा था,
चिल्ला रहा था गला फाड़कर,
किए जा रहा था काँव-काँव,
पर बेबस था वह भी.

अंत में थक गया वह,
उसने मेरी ओर देखा,
बीट की मुझपर 
और फुर्र से उड़ गया.

4 टिप्‍पणियां:

  1. अर्थ पूर्ण ... निःशब्द हूँ .. स्तब्ध हूँ ...
    लाजवाब रचना ...

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  2. कड़वा सच... अर्थपूर्ण रचना के लिए शुभकामनाएँ.

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  3. यह कविता बहुत अच्छी लगी। इसका व्यंग्य मारक है।..बधाई।

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