मैं मालगाड़ी हूँ,
धीरे-धीरे चलती हूँ,
हर पैसेंजर, हर एक्सप्रेस को
चुपचाप रास्ता देती।
मेरी राह में भी आते हैं
बहुत सारे स्टेशन,
पर किसी को नहीं रहता
मेरा इंतज़ार,
किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता
मेरे आने, न आने से।
कोई सूचना नहीं दी जाती
मेरे पहुँचने या छूटने की,
अफ़रा-तफ़री नहीं मचती
मेरे स्टेशन पहुँचने पर।
ऊँघते रहते हैं कुली अपनी जगहों पर,
चायवाले नहीं संभालते अपनी केतलियाँ,
हॉकर नहीं दौड़ते उठकर,
मनचले नहीं झाँकते खिड़कियों से।
अपमान, अनदेखी को अनदेखा कर,
मैं बढ़ती रहती हूँ मंज़िल की ओर,
जहां हो रहा होता है
उस सामान का बेसब्री से इंतज़ार,
जो मैं चुपचाप ढो रही हूँ।

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