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शनिवार, 21 मार्च 2026

848. निश्चय

 



रात को बार-बार चौंकती है,

झटके से उठ जाती है लड़की,

पसीने से लथपथ हो जाती है,

डरकर सहम जाती है लड़की। 


पानी के घूंट हलक से उतारती है, 

उठकर खिड़की तक जाती है, 

चुपके से गली में झाँकती है,

सब कुछ ठीक पाती है लड़की। 


फिर से बिस्तर पर आकर 

नींद का इंतज़ार करती है,

आज तय करती है लड़की, 

कल से टी.वी. नहीं देखेगी,

न ही अख़बार पढ़ेगी लड़की। 







4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 23 मार्च 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  2. भय तो भीतर बैठा है, टीवी या अख़बार केवल उसे बाहर लाते हैं, उस भय का क्या करेगी लड़की, जो बचपन से उसे घुट्टी में पिला दिया गया है

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