शुक्रवार, 29 मई 2020

४४०. प्रवासी

वह जो चला था 
कभी परदेस से 
अपने गाँव नहीं पहुंचा है,
रास्ते में ही कहीं फंसा है,
न आगे जा सकता है,
न पीछे लौट सकता है.

वह जो चला था 
कभी परदेस से 
बहुत परेशान है,
करे तो क्या करे,
उसकी जान उसके 
कंठ में अटकी है,
न आगे आ सकती है,
न पीछे लौट सकती है.

9 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (01जून 2020) को 'ख़बरों की भरमार' (चर्चा अंक 3719 ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

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  2. मार्मिक काव्य चित्र ओँकारजी। सच में बहुत असहाय सा बन कर रह गया है श्रमिक वर्ग। 🙏🙏

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  3. यथार्थ को इंगित करता बहुत सुंदर सृजन.
    सादर

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  4. आ ओंकार जी, सहज, सरल और स्पष्ट वक्तव्य ! सचमुच:
    उसकी जान उसके
    कंठ में अटकी है,
    न आगे आ सकती है,
    न पीछे लौट सकती है। --ब्रजेन्द्र नाथ

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  5. ण आगे ण पीछे ... सक्स्च हैं ... काश कोई उन्हें निकाले इस अटकाव के बंधन से ...

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