शनिवार, 17 सितंबर 2016

२२८. नमक

बहुत काम की चीज़ हूँ मैं,
थोड़ा सा खर्च होता हूँ,
पर स्वाद बढ़ा देता हूँ,
भारी हूँ सब मसालों पर.

घुल-मिल जाता हूँ आसानी से,
बिना किसी नाज़-नखरे के,
फिर भी ख़ास क़ीमत नहीं मेरी,
अपमान अनदेखी से दुखी हूँ मैं.

बहुत देर लगी मुझे समझने में 
कि जो आसानी से मिल जाता है,
वह कितना भी अच्छा क्यों न हो,
उसकी कद्र नहीं होती.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (18-09-2016) को "मा फलेषु कदाचन्" (चर्चा अंक-2469) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत देर लगी मुझे समझने में
    कि जो आसानी से मिल जाता है,
    वह कितना भी अच्छा क्यों न हो,
    उसकी कद्र नहीं होती.
    बहुत सुन्दर....

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  3. सच है आज नमक का हक़ कौन अदा करता है ...

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