शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

२२२. आँखें

वे नहीं चाहते 
कि औरतों के आँखें हों.

आँखें होंगी,
तो वे देख सकेंगी,
जान सकेंगी
कि क्या-क्या हो रहा है 
उनके ख़िलाफ़,
उन्हीं के सामने.

ज़बान से कुछ न बोलें,
तो भी हो सकता है 
कि आँखें दिखा दें,
या हो सकता है 
कि उनकी आँखों में 
झलक जाय 
उनकी नफ़रत.

कौन जाने 
कि चुपचाप देखते-देखते 
कभी उनकी ज़बान 
खुल ही जाय
या कुछ ऐसा हो जाय,
जिसकी कभी किसी ने 
कल्पना भी न की हो. 

वे नहीं चाहते 
कि उनकी दुनिया में,
जहाँ वे खुश हैं,
सुरक्षित हैं,
कोई हलचल हो,
इसलिए वे इस बात के ख़िलाफ़ हैं 
कि औरतों के भी आँखें हों.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-07-2016) को "मौन हो जाता है अत्यंत आवश्यक" (चर्चा अंक-2413) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 24 जुलाई 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

    उत्तर देंहटाएं
  4. गहरी ... ये आदमी की चाल युग के शुरुआत से ही ... और पता नहीं कब तक रहने वाली है ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक दुखद पर शाश्वत सोच...बहुत सटीक प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं