बुधवार, 13 जुलाई 2016

२२१. उत्सव


आज सुबह बारिश हुई -
मूसलाधार बारिश,
भर गए सब खड्डे-नाले,
घुस गया पानी घरों में,
छिप गईं सड़कें,पगडंडियाँ,
रुक गया जैसे जीवन.

जब शाम हुई,
अस्त होते-होते मुस्करा उठा सूरज,
पानी की चादर पर बिखर गई 
ढेर सारी गुलाल
या गुलाब की पंखुडियां,
धरती-आकाश रंग गए 
एक ही रंग में.

कितनी भी कोशिश कर ले बारिश,
आख़िर मुस्करा ही उठता है सूरज,
कितना ही हो जाए विध्वंस,
रुकता कहाँ है उत्सव ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 18 जुलाई 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. समय तो चलता ही रहता है ... खुशियाँ हों तो गम और गम हो तो खुशियाँ कहाँ रूकती हैं ...

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  3. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

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