शनिवार, 2 जुलाई 2016

२२०. अपराध-बोध

अब नहीं रहा वह पढ़ने का सुख,
किताबों की सोहबत में जागने का सुख,
पढ़ते-पढ़ते ख़ुद को भूल जाना,
कभी हँसना,कभी रोना, कभी सहम जाना,
कभी पीठ के बल, तो कभी पेट के बल,
हथेलियों में किताब थामे लेट जाना,
आँख लगते ही किसी बच्चे की तरह 
किताब का पेट पर चुपचाप सो जाना.

अब मैं हूँ, मेरा लैपटॉप, मेरा मोबाइल है,
देर रात तक जागता हूँ अब भी,
घूमता हूँ इन्टरनेट की दुनिया में,
पढ़ता हूँ कुछ काम की बातें, कुछ बकवास,
फिर सो जाता हूँ थककर
एक अजीब से अपराध-बोध के साथ.

अगली रात फिर वही सिलसिला,
फिर वही लक्ष्यहीनता,
आख़िर में फिर थककर सो जाना,
फिर वही अपराध-बोध.

आजकल मैं अकसर सोचता हूँ
कि अच्छी-बुरी आदत, जो पड़ जाती है,
उसे बदलना इतना मुश्किल क्यों होता है.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-07-2016) को "गूगल आपके बारे में जानता है क्या?" (चर्चा अंक-2393) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सच है पर आज अधिकाँश लोग इस स्क्रीन के गुलाम हो गए हैं .... अच्छी रचना ...

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