शुक्रवार, 10 जून 2016

२१७. ग़म के आंसू



ग़म में निकलते हैं आंसू,
ख़ुशी में भी निकलते हैं,
जिस हाल में भी निकलें,
राहत-भरे होते हैं आंसू.

ग़म के हों या ख़ुशी के हों आंसू 
वैसे तो एक जैसे होते हैं,
पर न जाने मुझे 
ऐसा क्यों महसूस होता है 
कि जो आंसू ग़म में निकलते हैं,
उनमें नमक थोड़ा ज़्यादा होता है.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-06-2016) को "चुनना नहीं आता" (चर्चा अंक-2371) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 12 जून 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. गम के आँसुऔ में शायद नमक होता है.....जो जमाने ने जख्मों पर डाला होता है। एक वेहतरीन रचना । मुझे अच्छी लगी।

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  5. गहन अहसास...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  6. बहुत खूब ... कुछ तो फर्क होता ही है दोनों आंसुओं में ... गहरी आह भी तो होती है गम के आंसुओं में ....

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