शनिवार, 7 मई 2016

२१३. चिता

मैं जुटा रहा हूँ लकड़ियाँ,
सजा रहा हूँ अपनी चिता,
बचा रहा हूँ उसे बारिश से,
पर मौत है कि न आती है,
न बताती है कि कब आएगी.

मुझे भी जल्दी नहीं मरने की,
बस इतनी सी फ़िक्र है 
कि अगर मैं मर गया,
तो अजनबियों के इस शहर में 
कौन मुझे श्मशान ले जाएगा,
कौन मेरी चिता सजाएगा,
कौन उसमें आग लगाएगा. 

अगर थोड़ा भी अंदेशा हो जाए,
तो अपने पैरों पर चलकर जाऊं,
अपनी चिता पर लेट जाऊं
और एक चिंगारी डाल दूं उसमें 
अपनी आख़िरी सांस के साथ.

5 टिप्‍पणियां:

  1. जमाने के हिसाब से हिसाब लगाना मुश्किल है :)

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  2. क्या बात है ...इस रचना ने बहुत ही अच्छी हकीकत बयां किया है

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