शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

२०३. इंसान और कुत्ता

न जाने क्यों
आजकल इंसान
कुत्तों जैसे बनना चाहते हैं.

वे आदमियों की तरह नहीं,
कुत्तों की तरह लड़ते हैं,
उन्हीं की तरह जीभ लपलपाते हैं,
सुविधाओं के बदले
कोई पट्टे से बांधे
तो बेहिचक बंध जाते हैं.

इंसान ने कुत्तों से
बहुत कुछ सीखा है,
सिवाय वफ़ादारी के,
मौक़ा मिलते ही
एक इंसान दूसरे को
कुत्ते की तरह काट खाता है.

इंसान ने बहुत सारी बुराइयाँ
कुत्तों से सीख ली हैं,
पर अपनी बुराइयाँ नहीं छोड़ीं,
दरअसल अब इंसान
न इंसान रहा, न कुत्ता.

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 21 फरवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. सच कहा श्रीमान जी इंसानियत विलुप्तप्राय ही है।
    मेरी रचनायें पढें http://manishpratapmpsy.blogspot.com

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-02-2016) को "किन लोगों पर भरोसा करें" (चर्चा अंक-2259) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. खत्म होती जा रही इंसानियत पर गहरा कटाक्ष करती एक वेहतरीन रचना।
    अभिव्यक्ति मेरी पढें http://manishpratapmpsy.blogspot.com

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  5. एकदम सही कहा आपने । अपना उल्लू सीधा करने के लिए आज इंसान दुम हिलाता कहीं भी पहुँच जाता है ।

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  6. सार्थक व प्रशंसनीय रचना...
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  7. सही कहा आपने ,....इंसान इंसान न रहा!

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  8. यही तो खासियत है ... बुराइयां ही सीखता है इंसान .. फिर चाहे कुत्ते या बिल्ली या किसी और जानवर से हों ...

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  9. कटु सत्य है आप की रचना में. बुराइयों को ग्रहण करने में इंसान देर नहीं करता.

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