शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

१४९. दुविधा



लहरें मचल-मचलकर आती हैं,
किनारे को भिगोकर 
फिर समंदर में लौट जाती हैं,
पर उनका मन नहीं भरता,
किनारे से मिलने की चाह 
उन्हें फिर से खींच लाती है. 

अनवरत चलता रहता है 
यह आने-जाने का सिलसिला,
बस लहरों की ऊर्जा 
कभी कम  हो जाती है,
तो कभी ज़्यादा.

मुझे समझ नहीं आता 
कि लहरें तय क्यों नहीं कर लेतीं 
कि उन्हें क्या करना है 
आना है या नहीं, 
बंद क्यों नहीं कर देतीं 
बार-बार आना 
और आकर लौट जाना. 

मैं आज तक नहीं समझ पाया  
कि आखिर प्यार में 
इतनी दुविधा क्यों होती है. 

9 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे हिसाब से प्यार में बहुत सारी दुविधा न होकर अगर सुविधा हो तो फिर उसका मोल कोई नहीं समझ नहीं पायेगा ..और उसकी क़द्र करने वालों का भारी टोटा हो जाएगा .. ..
    बहुत बढ़िया ....

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-12-2014) को "बिलखता बचपन...उलझते सपने" (चर्चा-1834) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. दुविधा तब होती है जब ऑप्शन एक से ज़्यादा हो...अन्यथा दुविधा का आभाव होता है...

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  4. वाह .. क्या कनेक्शन जोड़ा है ... मज़ा आ गया रचना का ...

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  5. बहुत खूब...लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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  6. prem me ye duvidha bani hi rahni chahiye ..bahut lajawaab abhivyakti..

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