शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

१३३. ख्वाहिश

मैं तुम्हारे जूड़े में खोंसा गया 
एक बेबस फूल हूँ.
लगातार तुम्हारे साथ हूँ,
पर न तुम मुझे,
न मैं तुम्हें देख सकता हूँ.

डाल से अलग हूँ,
एक दिन का मेहमान हूँ,
कल मैं कुम्हला जाऊँगा,
तुम्हारे लायक नहीं रहूँगा.

तुम मुझे खींचकर 
अपने जूड़े से निकालोगी,
किसी गंदे कूड़ेदान में 
या ज़मीन पर फेंक दोगी.

मैं तुमसे नहीं कहूँगा 
कि मुझे जूड़े में रहने दो,
ऐसा कहना अन्याय होगा,
कहूँगा भी तो तुम मानोगी नहीं.

अब एक ही ख्वाहिश है मेरी 
कि मिट्टी में मिलने से पहले 
बस एक बार, सिर्फ़ एक बार 
मैं तुम्हारी नज़रों के सामने रहूँ.

18 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 21/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. अखबार और फूल का ये हश्र तो होना ही है...

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  3. दाल से टूटने के बाद फूलों की ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं ...

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  4. एक दिन का मेहमान हूँ,
    कल मैं कुम्हला जाऊँगा,
    तुम्हारे लायक नहीं रहूँगा.
    बढ़िया ।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. बहुत ही खुबसूरत
    और कोमल भावो की अभिवयक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण...

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