गुरुवार, 23 जनवरी 2014

११४. सूरज


बहुत थक गया हूँ मैं,
मुझे रोको मत, जाने दो.

मुझे विश्राम चाहिए,
अपने लिए नहीं, तुम्हारे लिए
ताकि तरोताज़ा होकर 
मैं फिर लौट सकूं,
फिर हो सकूं तुम्हारे साथ,
फिर भगा सकूं अँधेरा.

वैसे तुम परेशान क्यों हो?
अँधेरे में ऐसा क्या है,
जिससे डरा जाय?
वह तो खुद डरपोक है,
वह तो खुद कमज़ोर है,
छिपा होगा यहीं कहीं
मेरे जाने के इंतज़ार में.

जैसे ही मैं जाऊँगा,
वह निकल आएगा,
तुम्हें डराने, सताने,
पर उसे भी पता है 
कि मैं हारा नहीं हूँ,
बस थोड़ा थका हूँ.

उसे भी पता है
कि मैं शीघ्र लौटूंगा 
और तब उसे 
फिर से छिपना होगा.

9 टिप्‍पणियां:

  1. कल 25/01/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. वैसे तुम परेशान क्यों हो?
    अँधेरे में ऐसा क्या है,
    जिससे डरा जाय?
    अच्छी पंक्तियां....
    सादर....

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  3. मन के भाव को लिखा है .. एक अवस्था जिससे पार पाता है इन्सान हमेशा ...

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